मैं जितना ही हूँ,उतना तो जरूर हूँ

अब इस तरह मुझे न बचा के रख फानूस के जैसे तो न सजा के रख मैं खुद तलाश लूँगा अपनी मंज़िलें बाज़ार में दाम मेरा न बता के रख मैं नई ...
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जो परिन्दे डरते हैं हवाओं के बदलते रूख से

  जो मकाँ बनाते हैं,वो अपना घर नहीं बना पाते रेगिस्तान में उगने वाले पौधे जड़ नहीं बना पाते जिन्हें आदत हैं औरों के रहमो-करम पे ज...
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